सकीना का मेडिकल स्टोर

ये कहानी उस सकीना की है, जिसका झोलवी 72 के पास रवाना हो चुका था, और सकीना अपनी छोटी बहन तब्बू के साथ जीवन बिता रही थी, तब्बू का झोलवी भी 72 के पास पहुंच चुका था।

दोनों बहनें एक मेडिकल स्टोर चलाती थीं,

एक दिन लड्डन मेडिकल में कुछ लेने आया, लड्डन बड़े संकोच से मेडिकल में इधर उधर देख रहा था..

सकीना- क्या देख रहे हो…कुछ चाहिए…?

लड्डन- वो …वो…जरा केमिस्ट से बात करनी थी…

सकीना- मैं ही केमिस्ट हूँ, संकोच मत करो, जो भी चाहिए, स्पष्ट बताओ…मुझे आदत है, मेडिकल चलाते हुए, सब सुनने की…

लड्डन- ठीक है…बताता हूँ…. वो क्या है कि मुझे दिन भर खुराखारी करने का मन होता रहता है, कितना भी हाथ चला लूं…मन ही नही भरता…दिन में 5–7 बार तो आम बात है, कभी कभी 10 भी हो जाता है, औजार-ए-मोहब्बत हर वक्त आपे से बाहर ही रहता है…कोई ऐसी दवा दे दो जिससे औजार-ए-मोहब्बत शांत रहे…

सकीना सोच में पड़ गयी…पहली बार उल्टा ग्राहक देख रही थी, वरना सभी औजार-ए-मोहब्बत जगाने की दवाई मांगते थे…

सकीना- कुछ देर रुको मुझे अपनी बहन तब्बू से सलाह लेनी होगी…तुम पांच मिनट बैठो…मैं आती हूँ।
इतना बोल सकीना अंदर चली गयी, जब पांच मिनट बाद लौटी, तो लड्डन ने पूछा…

क्या हुआ…? क्या सलाह किया….कोई दवाई दे सकते हैं…?

सकीना- हां बिल्कुल, हम दोनों बहनों ने फैसला किया है कि तुम्हे 20 हजार रुपया महीना और तीनों वक्त का खाना देंगे…पर शर्त यह है कि तुम्हे पूरे 24 घंटे यहीं हमारे साथ रहना होगा…..

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